SEBA Class 10 Sanskrit (সংস্কৃত) | Chapter 2 | PDF

द्वितीय: पाठ:

चन्द्रभूपते: कथा PDF Assamese

चन्द्रभूपते: कथा

প্ৰস্তুত পাঠটি বিষ্ণুশৰ্মাই লিখা ‘পঞ্চতন্ত্ৰ’ নামৰ গ্ৰন্থখনিৰ পৰা সংকলিত কৰা হৈছে। গ্ৰন্থখনিৰ ‘অপৰীক্ষিতকাৰিতা’ নামৰ খণ্ডটোত থকা এই গল্পটোত চন্দ্ৰ নামৰ অত্যন্ত লোভী ৰজা এজনৰ কাহিনী বৰ্ণনা কৰা হৈছে। এই কাহিনীভাগত ৰজা চন্দ্ৰই ৰত্নমালাৰ লোভত বশবৰ্ত্তী হৈ নিজৰ পৰিয়াল আৰু আত্মীয়ক কেনেকৈ হেৰুৱাবলগীয়া হৈছিল, তাৰ বৰ্ণনা কৰা হৈছে। এই কাহিনীভাগৰ দ্বাৰা এই নীতিশিক্ষাকে দিবলৈ বিচৰা হৈছে যে মানুহে বিচাৰ-বিবেচনা নকৰাকৈ কোনো কামেই কৰিব নালাগে আৰু লোভেই হৈছে বিনাশৰ মূল কাৰণ।

The prepared text is an extract from विष्णुशर्मा’s ‘पञ्चतन्त्र’. This story has been taken from the section of the book named ‘अपरीक्षितकारिता’ and is about a very greedy king. The story here is about how the king चन्द्र lost his family and relatives because of his greed for ‘रत्नमाला’. The moral of the story is that a man should not do anything without giving it proper thought and that greed is the cause of destruction.

कस्मिंश्र्चत् नगरे चन्द्रो नाम भूपति: प्रतिवसति स्म। तस्य पुत्रा वानरक्रीडारता वानरयूथं नित्यमेव अनेकभोजनभक्ष्यादिभि: पुष्टिं नयन्ति स्म। तस्मिन् राजगृहे लघुकुमारवाहनयोग्यं मेषयूथमस्ति। तेषु एको जिह्वालौल्यात्अ हर्निशं नि:शङ्कं महानसे प्रविश्य यत् पश्यति तत् सर्वं भक्षयति। ते च सूपकारा यत् किञ्चित् काष्ठं मृन्मयं भाजनं वा पश्यन्ति, तेनाशु ताडयन्ति। वानरयूथपस्तद् दृष्ट्वा व्यचिन्तयत्- ‘अहो! मेषसूपकारकलहोऽयं वानराणां क्षयाय भविष्यति।’ एवं निश्चित्य सर्वान् वानरान् आहूय रहसि प्रोवाच—

तस्मात्स्यात्कलहो यत्र गृहे नित्यमकारण:।

तदगृहं जीवितं वाञ्छन्दूरत: परिवर्जयेत्।।

तथा च,

कलहान्तानि हर्म्याणि कुवाक्यान्तं च सौहृदम्।

कुराजान्तानि राष्ट्राणि कुकर्मान्तं यशो नृणाम्।।

तत्र यावत् सर्वेषां संक्षयो भवति तावदेतत् राजगृहं संत्यज्य वनं गच्छाम:। तत्तस्य वचनं श्रुत्वा मदोद्धता वानरा: तं तिरस्कारम् अकुर्वन्। तदा वानरयूथपति: प्रोवाच-रे रे मूर्खा:, यूयं राजगृहस्य सुखस्य परिणामं न जानीथ। तदहं कुलक्षयं स्वयं नावलोकयिष्यामि। साम्प्रतं वनं यास्यामि। उक्तं च—

मित्रं व्यसनसंप्राप्तं स्वस्थानं परपीडितम्।

घन्यास्ते ये न पश्यन्ति देशभङ्गं कुलक्षयम्।।

अथ एकदा दैवदुर्विपाकात् राजभवनस्य अनेके अश्वा: भृशं दग्धा:। राजा सविषाद: राजवैद्यान् आहूय प्रोवाच-भो: प्रोच्यतामेषामश्वानां कशिचद्दाहोपशमनोपाय:। तेऽपि शास्त्राणि संचिन्त्य प्रोचु:-

कपीनां मेदसा दोषो वह्निदाहसमुद्भव:।

अश्वानां नाशमभ्येति तम: सूर्योदये यथा।।

वेद्यवचनानि पालयन् राजा अश्वोपचाराय आदिशत्। एवं अश्वोपचाराय बहवो वानरा: घातिता:।

अथ पूर्वमेव त्यक्तराजभवन: वानरयूथपति: इमं वृत्तान्तम् अश्रृणोत्। स अचिन्तयत्- ‘कथमहं तस्य नृपसचिवादीनां स्वकुलनाशकर्तृणां नाशं करिष्यामि’ इति। एवं चिन्तयन् स: वने स्थितस्य पद्मिनीखण्डमण्डितस्य एकस्य सरोवरस्य वैचित्र्यं ज्ञातवान्। य: क्रोऽपि तस्मिन् सरोवरे प्रविशति तस्य निष्क्रमणं न भवति। स: पद्मिनीनालमादाय दूरस्थीऽपि सरोवरजलं पातुमारभत। तथानुष्ठिते तन्मध्याद्राक्षसो निष्क्रम्य रत्नमालाविभूषितकराण्ठस्तमुवाच-‘भो! अत्र य: सलिले प्रवेशं करोति स मे भक्ष्य इति। तन्नास्ति धूर्ततरस्त्वत्समोऽन्यो यत्पानीयमनेन विधिना पिबसि। तत: तुष्टोऽहम्। प्रार्थयस्व हृदयवाञ्छितम्।’ कपिराह -‘अस्ति केनचित् भूपतिना सह अत्यन्तं वैरम्। यदि त्वम् एनां रत्नमालां मे प्रयच्छसि तत् सपरिवारमपि तं भूपतिं वाक्यप्रपञ्चेन लोभयित्वात्र सरसि यथा प्रविशति तथा करोमि।’ प्रसन्न: राक्षस: तस्य वचनं श्रुत्वा रत्नमालां दत्त्वा प्राह- ‘भो मित्र, यत्समुचितं भवति तत् कर्तव्यमिति’।

अथ राक्षसदत्तां रत्नमालां धारयित्वा स: वानरयूथप: नगरं प्रविष्ट:। तत्र केनचित् जनेन धृत: स: राज्ञ: समक्षम् आनीत:। अथ भूभुजा वानर: समाहूत: रत्नमालाविषये पृष्टश्चा। वानर: प्राह-अस्ति कुत्रचिदरण्ये गुप्ततरं महत्सरो धनदनिर्मितम्। तत्र सूर्येऽर्धोदिते रविवासरे य: कश्र्चिन्निमज्जति स रत्नमालाभूषितकण्ठो नि:सरति।

तथानुष्ठिते भूपतिना सह रत्नमालालोभेन सर्वे कलत्रभृत्या: प्रस्थिता:। तत्र वानरोक्तविधिना राज्ञ: सर्वे जना: जले प्रवेशिता:। सद्य एव प्रविष्टास्ते लोका: सर्वे रत्नमालाभूषितेन राक्षसेन भक्षिता:। अथ तेषु चिरायमाणेषु राजा वानरमाह- ‘भो, यूथाधिप, किमिति चिरायते मे जन:।’ तच्छुत्वा वानर: सत्वरं वृक्षमारुह्य राजानमुवाच-‘भो, दुष्ट नरपते, अन्त:सलिलस्य स्थितेन राक्षसेन भक्षितस्ते परिजन:। साधितं मया कुलक्षयजं वैरम्। त्वं स्वामीति मत्वा नात्र प्रवेशित:। धिक् त्वां लोभाभिभूतात्मानम्।’

उक्तं च-

कृते प्रतिकृतिं कुर्याद्धिंसिते प्रतिहिंसितम्।

न तत्र दोषं पश्यामि दुष्टे दुष्टं समाचरेत्।।

শব্দাৰ্থ : (Word Meaning in Assamese)चन्द्रभूपते

भूपति:ৰজা/ a king
मेषयूथम्ভেড়াৰ জাক/a flock of sheep
महानस्ৰান্ধনিঘৰ/ kitchen
सूपकार:ৰান্ধনি/ cook
भाजनम्পাত্ৰ/ vessel
कलह:কাজিয়া/ quarrel
रहसिগোপনে/ secretly
हर्म्याणिঘৰবোৰ/ houses.
मदोद्धताঅহংকাৰী/ proud.
दैवदुर्विपाकात्দুৰ্ভাগ্যবশত:/ because of hard luck.
भृशम्বহুত/ very much.
दग्धाপুৰি যোৱা/ burnt.
राजवैद्य:ৰজাৰ চিকিৎসক/ a royal physician.
दाहोपशमनজ্বলনৰ বেদনা উপশম/ to get relief from burning sensation.
कपीবান্দৰ/ monkey.
घातिताমাৰি পেলোৱা/ killed.
पद्मिनीপদুম ফুল/ lotus.
आरभतআৰম্ভ কৰিলে/ began.
भक्ष्य:ভোজনৰ যোগ্য/ edible.
वैरम्শত্রুতা/ enmity.
वाक्यप्रपञ्चेनভোল যোৱা কথাৰে/ by means of clever speeches.
सरसिসৰোবৰলৈ/ to the lake.
गुप्ततरम्গোপনে/ quite apart from view.
धनद:কুবেৰ/ an epithet of the god of wealth.
आकर्ण्यশুনি/ hearing.
भक्षित:খাই পেলালে/ had been eaten.
चिरायतेপলম কৰা/ delays.
सत्वरम्তৎক্ষণাৎ/ immediately.
अन्त:सलिलस्यপানীৰ তিতৰত/ in underground water.
साधितम्সম্পাদন কৰিলে/ accomplished.
समाचरेत्একেই আচৰণ কৰা/ to act in the same manner.

পাঠভিত্তিক ব্যাকৰণ (Textual Grammar)

नयन्ति√नी + लट् अन्ति।
अहर्निशम्अहश्र्च निशा च = द्वन्द्वसमास:
प्रविश्यप्र-√विश् + ल्यप्।
तेनाशुतेन + आशु।
दृष्द्वा√दृश् + कत्वाच््।
आहूयआ-√ह्वे + ल्यप्।
प्रोवाचप्र-√ब्रू + लिट् अ।
संत्यज्यसम्-√त्यज् + ल्यप्।
श्रुत्वा√श्रु + क्त्वाच्।
राजगृहस्यराज्ञः गृहं = राजगृहम् (षष्ठी ततपुरुषः),तस्य।
जानीथ√ज्ञा + लट् थ।
यास्यामि√या + लृट् स्यामि।
दग्धा:√दह् + क्त प्रथमाविभक्तेः बहुवचने।
संचिन्त्यसम् + √चिन्त् + ल्यप्।
प्रोचु:प्र-√ब्रू + लिट् उस्।
ज्ञातवान्√ज्ञा + क्तवतु, प्रथमाविभक्तेः एकवचने।
आदायआ-√दा + ल्यप्।
पातुम्√पा + तुमुन्।
रत्नमालाविभूषितकण्ठ:रत्नानां माला (षष्ठी ततपुरुषः), रत्नमालया विभूषितः कण्ठः यस्य (बहुव्रीहिः) सः।
भूपतिना‘सहयुक्तेsप्रधाने’ इति सूत्रेण तृतीया विभक्ति:।
प्रविष्ट:प्र-√विश् + क्त, प्रथमा विभक्ते: एकवचने।
स्वयमेष्यामिस्वयम् + एष्यामि। √इ + लृट् स्यामि=एष्यामि।
तच्छुत्वातत् + श्रुत्वा।
कुर्याद्धिंसितेकुर्यात् + हिंसिते।

অনুশীলনী (Exercise)

1. এই পাঠৰ কাহিনীভাগ চমুকৈ বৰ্ণনা কৰাঁ।

Narrate briefly the story of this lesson:

2. প্ৰসঙ্গ-সঙ্গতি দেখুৱাই তলৰ শ্লোক দুটাৰ ব্যাখ্যা কৰাঁ :

Explain with reference to the context the following two verses:

(क) मित्रं व्यसनसंप्राप्तं स्वस्थानं परपीडितम्।

धन्यास्ते ये न पश्यन्ति देशभङ कुलक्षयम्।।

(ख) कृते प्रतिकृतिं कुर्याद्धिंसिते प्रतिहिंसितम्।

न तत्र दोषं पश्यामि दुष्टे दुष्टं समाचरेत्।।

3.তলৰ প্ৰশ্নসমূহৰ উত্তৰ দিয়াঁ :

Answer the following questions:

(ক) ৰজাজনৰ নাম কি আছিল?

What was the name of the king?

(খ) বান্দৰৰ দলপতিয়ে ৰাজপ্রাসাদৰ পৰা কিয় বনলৈ গুচি যাব লৈ বিচাৰিছিল?

Why did the leader of the monkeys want to go to the forest from the king’s palace?

(গ) দলপতিয়ে বান্দৰৰ জাকটোক কি উপদেশ দিছিল আৰু তাৰ ফলাফল কি হৈছিল?

What advice did the leader give to the monkeys and what was the result?

(ঘ) বান্দৰৰ দলপতিজন কি উদ্দেশ্যেৰে পদুমফুলেৰে ভৰপূৰ সৰোবৰটোলৈ গৈছিল?

For what purpose did the leader of the monkeys go to the lake full of lotuses?

(ঙ) বান্দৰৰ দলপতিয়ে কেনেদৰে ৰজা চন্দ্ৰৰ ওপৰত প্রতিশোধ ল’লে?

How did the leader of the monkeys take his revenge on king Chandra?

4. তলত দিয়া পদসমূহৰ ব্যুৎপত্তি নির্ণয় কৰাঁ :

Derive the following words:

प्रतिवसति; भक्षयति; गच्छाम: ; अकुर्वन्; आदिशत्; घातिता: ; चिन्तयन्; कर्तव्यम्; प्रस्थिता:; मत्वा।

5. তলত দিয়া শব্দবোৰৰ সন্ধি বিচ্ছেদ কৰাঁ :

Disjoin the Sandhis in the following words:

नित्यमकारण: ; तस्मात्स्यात्कलहो; वाञ्छन्दूरत: ; प्रोच्यतामेषामश्वनाम्;

तन्मध्याद्राक्षसो; धूर्ततरस्त्वत्समोsन्यो; सूर्येsर्धोदिते; भक्षितस्ते।

6. তলত দিয়া পদবোৰৰ বিভক্তি নির্ণয় কৰাঁ :

Account for the case-endings in the following words:

महानसे; दैवदुर्विपाकात्; राजवैद्यान्; अश्वोपचाराय; वानरा: ; राज्ञ: ; धनद:।

7. সংস্কৃত প্রতিশব্দ লিখাঁ :

Give Sanskrit equivalents of:

भूपति: ; वानर: ; भाजनम्; महानस; तिरस्कारम्; भृशम्; सलिलम्; राक्षस:।

8. ‘ক’ স্তম্ভৰ বিশেষণপদৰ লগত ‘খ’ স্তম্ভৰ বিশেষ্য পদবোৰ মিলোৱাঁ :

Match the following adjective words of ‘क’ group with the noun words of ‘ख’ group:

(क)(ख)
रत्नमालाभूषितःराजा
अर्धादितेमेषयूथम्
पद्मिनीखण्डमण्डितःसूर्ये
लघुकुमावाहनयोग्यःसरोवरः

9. সংস্কৃতলৈ অনুবাদ কৰাঁ :

Translate into Sanskrit:

(ক) পশুক হত্যা নকৰিবাঁ৷

Do not kill animals.

(খ) পশুবিলাকৰ প্রতি আমি সদয় হোৱা উচিত।

We should be kind towards the animals.

(গ) চৰিত্ৰই মানুহৰ আটাইতকৈ শ্রেষ্ঠ সম্পদ।

Character is the greatest wealth of a man.

(ঘ) চৰিত্র নষ্ট হোৱা মানে সর্বস্ব নষ্ট হৈ যোৱা।

Once Character is lost everythings is lost.

টোকা : Notes

(क) पञ्चतन्त्रम् গ্রন্থ পরিচয় : পঞ্চতন্ত্র এখন বিখ্যাত সংস্কৃত গল্প সাহিত্য। বিভিন্ন পশু-পক্ষী, জীৱ জন্তুৰ মাজেৰে, এই গ্রন্থখনৰ জৰিয়তে নীতিমূলক শিক্ষা প্রদান কৰা হৈছে। মহিলাৰোপ্য নামৰ নগৰখনৰ ৰজা অমৰশক্তিৰ মূৰ্খ পুত্রসকলক ৰাজনীতিৰ শিক্ষা দিয়াৰ উদ্দেশ্যে বিষ্ণুশৰ্মাই এই গ্রন্থখন ৰচনা কৰিছিল। পঞ্চতন্ত্র পাঁচখন ‘তন্ত্র’ অৰ্থাৎ আখ্যানৰ সমষ্টি। এই পাঁচটা খণ্ড হৈছে— মিত্রভেদ, মিত্র-সংপ্রাপ্তি, কাকোলূকীয়, লব্ধপ্রণাশ আৰু অপৰীক্ষিতকাৰিতা ৷ পঞ্চতন্ত্রত সর্বমুঠ ৭০ টা কাহিনী আৰু প্রায় ৯০০ টা শ্লোক আছে। খৃষ্টীয় প্রথম শতিকাৰ পৰা সপ্তম শতিকাৰ ভিতৰত ৰচনা কৰা এই গ্রন্থখন দেশী-বিদেশী বিভিন্ন ভাষালৈ অনুদিত হৈছে।

पञ्चतन्त्रम : पञ्चतन्त्रम a famous work in Sanskrit literature. It is a fable which uses different stories and conversations of birds and animals to impart some morals. विष्णुशर्मा had written the ‘पञ्चतन्त्र’ to educate the foolish sons of king अमरशक्ति who was the king of the city named महिलारोप्य. In the word ‘पञ्चतन्त्र’, ‘पञ्च’ means five and ‘तन्त्र’ means a section or a collection. The five collections are -मित्रभेद, मित्रसंप्राप्ति, काकोलूकीय, लब्धप्रणाश and अपरिक्षितकारिता. This book comprising seventy stories has about nine hundred slokas in it. Written during the period of 1 st century to 7th century A.D., the book has been translated to many languages world wide.

( খ ) লোভৰ বৰ্জনীয়তা সম্পর্কে ৰচিত আন দুটা শ্লোক হৈছে—

Two other verses discarding greediness are as follows:

(क) लोभात्क्रोघः प्रभवति लोभात्क्रोधः प्रजायते।

लोभान्मोहश्च नाशश्च लोभः पापस्य कारणम्।।

(ख) मातरं पितरं पुत्रं भ्रातरं वा सुहृत्तमम्।। लोभाविष्टो नरो हन्ति स्वामिनं वा सहोदरम्।।

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